लोकतंत्र बनाम दमन: ईडी की कार्रवाइयों पर उठते सवाल

भारतीय लोकतंत्र की नींव उस भरोसे पर टिकी है, जहाँ शासन, संविधान और जनता के बीच विश्वास की एक अदृश्य डोर बंधी होती है। परन्तु जब यही डोर सत्ता की हठधर्मिता और संस्थाओं के दुरुपयोग से टूटने लगे, तब एक सशंकित समाज प्रश्न करता है—क्या लोकतंत्र केवल एक चुनावी प्रक्रिया बनकर रह गया है? क्या सत्तासीन शक्तियाँ, जनादेश को अनदेखा कर अपने विरोधियों को कुचलने में एजेंसियों का प्रयोग कर रही हैं? यह प्रश्न आज आम जनमानस से लेकर बुद्धिजीवियों तक के मन में गूंज रहा है।
ईडी—यानी प्रवर्तन निदेशालय—एक ऐसी संस्था जो आर्थिक अपराधों की जांच के लिए गठित की गई थी, आज अपने आचरण को लेकर स्वयं कठघरे में खड़ी है। हाल के दिनों में जिस प्रकार ईडी ने छत्तीसगढ़ में कार्रवाइयाँ की हैं, उसने उसकी निष्पक्षता और संवैधानिक मर्यादाओं पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यकाल के दौरान और बाद में, जिस तरह से उनके निकट सहयोगियों पर, उनके निजी सचिवों और विशेष सहायकों पर ईडी ने छापे मारे, वह सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई से अधिक राजनीतिक प्रतिशोध की आभा लिए हुए प्रतीत होती है। और अब, जब उनके पुत्र—जो किसी संवैधानिक या राजनीतिक पद पर नहीं हैं—के जन्मदिन के दिन ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, तो इसे संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित संदेश माना जा रहा है।
इस प्रकार की कार्रवाइयों से आम जनता के मन में यह बात बैठने लगी है कि प्रवर्तन निदेशालय अब केवल कानून पालन करने वाली संस्था नहीं रह गई है, बल्कि सत्ताधारी दल के हाथों में एक राजनीतिक औजार बन गई है। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी भी इस आशंका को पुष्ट करती है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि “ईडी को अपनी सीमाओं का ज्ञान होना चाहिए।” जब सर्वोच्च न्यायालय जैसी संवैधानिक संस्था को भी चेतावनी देनी पड़ी, तो यह स्थिति की गंभीरता को दर्शाती है।
छत्तीसगढ़ में ईडी की गतिविधियों के प्रति स्थानीय लोगों का आक्रोश केवल क्षेत्रीय नहीं रहा। यह भाव अब राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में गूंजने लगा है। यह जनाक्रोश केवल राजनैतिक पक्षधरता का नहीं, बल्कि संस्थाओं की विश्वसनीयता के हनन का परिणाम है। डबल इंजन सरकार, जो विकास, सुशासन और पारदर्शिता के नाम पर सत्ता में आई थी, अब उसे जनता यह पूछ रही है कि क्या विकास का यही मार्ग है—राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाना, संस्थाओं का प्रयोग कर डर फैलाना?
भूपेश बघेल के प्रति जनता और बुद्धिजीवियों की सहानुभूति का एक प्रमुख कारण यह है कि वे न केवल एक जमीनी नेता हैं, बल्कि अपने परिवार को राजनीति से दूर रखने की सोच भी रखते रहे हैं। यह जनमत है कि जो व्यक्ति अपने पुत्र को राजनीतिक मंच से दूर रखने की सोच रखता है, वह उसे भ्रष्ट आचरण में कभी संलिप्त नहीं होने देगा। यही कारण है कि जब उनके पुत्र पर ईडी की कार्रवाई हुई, तो आम जनता को यह सत्ता का भयभीत चेहरा नजर आया, न कि न्याय का कोई वास्तविक प्रयास।
दिल्ली, झारखंड और अब छत्तीसगढ़—तीनों राज्यों में जहाँ-जहाँ गैर-भाजपा मुख्यमंत्री हैं या थे, उन्हें निशाने पर लिया गया। यह महज़ एक संयोग नहीं हो सकता। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी हो, या झारखंड के हेमंत सोरेन का इस्तीफा—हर मामले में ईडी की सक्रियता एक ही दिशा में इंगित करती है। यदि यह एक राजनैतिक एजेंडा नहीं है, तो फिर क्या है?
छत्तीसगढ़ में हालिया दिनों में हुए विरोध-प्रदर्शन, चक्काजाम और धरनों में केवल कांग्रेस के कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि आम जनता की भी बड़ी भागीदारी देखी गई। विशेषकर तब, जब प्रशासन ने भी बल प्रयोग से परहेज़ किया, यह संकेत देता है कि तंत्र में बैठे लोगों का भी मन कहीं न कहीं इस रवैये से खिन्न है। एक संवेदनशील लोकतंत्र में यह संकेत मामूली नहीं होता। यह बताता है कि डबल इंजन की सरकार अब उस जनविश्वास को खोने लगी है, जो उसे सत्ता तक लाया था।
ईडी के इस कथित दुरुपयोग से जो सबसे बड़ा खतरा उपजा है, वह है संस्थाओं की विश्वसनीयता का पतन। यदि कोई एजेंसी एक विशेष विचारधारा या दल के अधीन मानी जाने लगे, तो वह संस्था नहीं रह जाती—वह एक औजार बन जाती है। और जब जनता यह महसूस करने लगे कि अब न्याय नहीं, केवल राजनीति हो रही है, तब लोकतंत्र की आत्मा पर चोट लगती है।
आज आवश्यकता है कि हम, आम नागरिक, इन घटनाओं को केवल समाचारों की सुर्खियाँ मानकर न गुजरें। बल्कि इनके पीछे छिपी मंशा, इनसे उपजे प्रभाव और इनसे जुड़ी संवैधानिक जटिलताओं को समझें। एक स्वस्थ लोकतंत्र में सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों की समान महत्ता होती है। जब एक पक्ष को कुचलने की प्रक्रिया संस्थाओं के माध्यम से होती है, तो वह शासन का पतन और तानाशाही की आहट होती है।
ईडी जैसी संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता और निष्पक्षता सबसे मूल्यवान है। यदि वही क्षीण हो जाए, तो देश का हर नागरिक असुरक्षित हो जाता है। छत्तीसगढ़ की जनता, और विशेषकर युवा वर्ग, इस बात को आज बखूबी समझ रहा है। वे यह पहचान चुके हैं कि यदि आज चुप रहे, तो कल यह भय और दमन उनके दरवाज़े पर होगा।
अतः यह समय है सजग रहने का, सतर्क रहने का और लोकतंत्र की संस्थाओं को बचाने का। सत्ता आएगी और जाएगी, लेकिन यदि संस्थाएं ध्वस्त हो गईं, तो लोकतंत्र का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।



