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छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल 64 वर्ष के हुए, ‘कका’ के नाम से मशहूर नेता का राजनीतिक और व्यक्तिगत सफर

राजनीतिक सफर: युवा कांग्रेस से लेकर मुख्यमंत्री और विपक्ष में आक्रामक नेता तक

किसान परिवार से मुख्यमंत्री तक: संघर्ष और संस्कृति से जुड़ा जीवन

ईडी दफ्तर घेराव में दिखी आक्रामक और जुझारू छवि

परिवार संग जन्मदिन मनाते हुए साझा कीं निजी तस्वीरें

       रायपुर। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल आज 23 अगस्त 2025 को अपना 64वां जन्मदिन मना रहे हैं। आक्रामक अंदाज, तेज-तर्रार छवि और अपने बेबाक बयानों के लिए पहचाने जाने वाले बघेल को उनके समर्थक और चाहने वाले प्यार से ‘कका’ कहते हैं। दुर्ग जिले की पाटन तहसील के कुरुदडीह गांव में 23 अगस्त 1960 को एक साधारण किसान परिवार में जन्मे बघेल का जीवन हमेशा से किसानों और छत्तीसगढ़ी संस्कृति से गहराई से जुड़ा रहा है।

किसान परिवार से मुख्यमंत्री तक का सफर

       भूपेश बघेल बचपन से ही खेती-किसानी और ग्रामीण परिवेश से जुड़े रहे। यही कारण है कि मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने न सिर्फ किसानों की भलाई के लिए कई योजनाएँ लागू कीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी संस्कृति और परंपराओं को भी बढ़ावा दिया। उनके पांच साल के कार्यकाल में हरेली तिहार, पोला, तीज और अन्य पारंपरिक त्योहार मुख्यमंत्री निवास में धूमधाम से मनाए जाने लगे। उन्होंने मुख्यमंत्री आवास को छत्तीसगढ़ी संस्कृति का प्रतीक बनाने की कोशिश की।

जन्मदिन से पहले राजनीतिक सक्रियता

       अपने जन्मदिन से ठीक एक दिन पहले यानी 22 अगस्त को पूर्व मुख्यमंत्री ने अपनी जुझारू और फुर्तीली छवि एक बार फिर दिखा दी। दरअसल, ईडी दफ्तर का घेराव करने निकले कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच बघेल भी पहुंचे। इस दौरान कार्यकर्ताओं ने उन्हें कंधे पर उठा लिया और वह बैरिकेड्स पार करते हुए ईडी दफ्तर तक पहुंच गए। हालांकि, पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया।

इस घटना का वीडियो उन्होंने खुद सोशल मीडिया पर साझा करते हुए लिखा—

“अभी तक ऐसा बैरिकेड नहीं बना जिसकी ऊंचाई हमारे कार्यकर्ताओं के हौसले से ज्यादा हो। लड़ेंगे, जीतेंगे।”

       यह वीडियो कुछ ही घंटों में वायरल हो गया और एक बार फिर बघेल की सख्त और जुझारू छवि लोगों के सामने आई।

परिवार संग जन्मदिन की तस्वीरें साझा

       अपने 64वें जन्मदिन के अवसर पर बघेल ने सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीरें साझा कीं। इसमें वह अपनी पत्नी मुक्तेश्वरी बघेल के साथ जन्मदिन मनाते नजर आए। उन्होंने लिखा—
“जन्मदिन की शुरुआत मुक्तेश्वरी जी के साथ।”

एक अन्य पोस्ट में उन्होंने लिखा—

“बच्चे सुबह का इंतजार नहीं करते। अर्धरात्रि ही केक काटने का आदेश हुआ, जिसका मैंने अक्षरशः पालन किया।”

राजनीतिक सफर की शुरुआत

       भूपेश बघेल ने राजनीति में कदम युवा कांग्रेस से रखा। साल 1993 में वह पहली बार पाटन विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। इसके बाद वह लगातार पांच बार इसी सीट से चुनाव जीतते रहे। लंबे राजनीतिक संघर्ष और संगठन में सक्रिय भूमिका निभाने के बाद 17 दिसंबर 2018 को वह छत्तीसगढ़ के तीसरे निर्वाचित मुख्यमंत्री बने।

पहली बार चुनाव जीतकर बने मुख्यमंत्री

       यहां यह उल्लेखनीय है कि भूपेश बघेल छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री हैं, जो सीधे विधानसभा चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बने। इससे पहले राज्य के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी और दूसरे मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह उपचुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे।

       भूपेश बघेल ने 2018 के विधानसभा चुनाव में पाटन से भाजपा प्रत्याशी मोतीलाल साहू को 9,343 वोटों से हराया था। इस जीत ने उन्हें कांग्रेस का निर्विवाद नेता बना दिया।

छत्तीसगढ़ की राजनीति में योगदान

       भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री रहते हुए किसानों के कर्जमाफी, गोधन न्याय योजना, राजीव गांधी किसान न्याय योजना जैसी योजनाओं को लागू कर छत्तीसगढ़ में एक नई दिशा दी। उन्होंने किसानों को समर्थन मूल्य पर धान खरीदी का वादा निभाया, जिससे उन्हें किसानों का नेता कहा जाने लगा।

       उनके कार्यकाल में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय मंच पर पहचान मिली। मुख्यमंत्री निवास में परंपरागत वाद्ययंत्रों, नृत्यों और तीज-त्योहारों का आयोजन कर उन्होंने यह संदेश दिया कि छत्तीसगढ़ी संस्कृति ही राज्य की असली पहचान है।

विपक्ष के तौर पर भी सक्रिय

       मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद भी भूपेश बघेल लगातार सक्रिय राजनीति में बने हुए हैं। वह भाजपा सरकार पर आक्रामक शैली में निशाना साधते रहे हैं। हाल ही में ईडी दफ्तर के घेराव के दौरान उनका जोश और उत्साह देखकर उनके समर्थकों ने कहा कि “कका अभी भी उसी ऊर्जा के साथ लड़ाई लड़ रहे हैं, जैसे वह युवावस्था में करते थे।”

       छत्तीसगढ़ की राजनीति में भूपेश बघेल एक ऐसे नेता के रूप में पहचाने जाते हैं, जिन्होंने किसानों, संस्कृति और आम जनता की आवाज को मजबूत किया। 64 वर्ष की उम्र में भी उनकी सक्रियता और राजनीतिक ऊर्जा उन्हें खास बनाती है।

       उनका जन्मदिन सिर्फ एक उत्सव नहीं बल्कि उनके अब तक के सफर की याद दिलाता है—एक किसान परिवार का बेटा कैसे छत्तीसगढ़ की राजनीति की सबसे ऊंची कुर्सी तक पहुंचा और आज भी जनता की आवाज़ बनकर खड़ा है।

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