कम भोजन, ज़्यादा विलासिता: क्या यही है नए भारत की हकीकत?

एंजेल के नियम से झलकती असमानता की कहानी
अर्थशास्त्र की दुनिया में एक पुराना सिद्धांत है — एंजेल का नियम। यह नियम बड़ी सहजता से बताता है कि जैसे-जैसे किसी व्यक्ति की आय बढ़ती है, उसके कुल खर्च में भोजन का हिस्सा घटने लगता है, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन और विलासिता की वस्तुओं पर व्यय बढ़ जाता है। सुनने में यह एक सामान्य आर्थिक तथ्य लगता है, पर आज के भारत में यही नियम सामाजिक यथार्थ का आईना बन गया है।
देश की वर्तमान आर्थिक परिस्थितियाँ इस सिद्धांत को जीवंत रूप में प्रस्तुत करती हैं। महँगाई की मार झेल रहा निम्न वर्ग अब भी अपनी आय का बड़ा हिस्सा रोटी, दाल और जरूरी खाद्य सामग्री पर खर्च करने को मजबूर है। उनके लिए भोजन केवल आवश्यकता नहीं, बल्कि संघर्ष का केंद्र बन गया है। दूसरी ओर, उच्च आय वर्ग के लिए खर्च की दिशा बदल चुकी है — महँगी गाड़ियाँ, प्रीमियम ब्रांड, विदेशी यात्राएँ और विशिष्ट सेवाएँ उनके उपभोग का हिस्सा बनती जा रही हैं।
आँकड़े यह भी बताते हैं कि भारत की कुल संपत्ति का बड़ा भाग शीर्ष 1 प्रतिशत लोगों के हाथों में केंद्रित है। यह असमान वितरण मध्यम और निम्न वर्ग की क्रय शक्ति को सीमित करता है। जब आय का अधिकांश हिस्सा बुनियादी जरूरतों में ही खर्च हो जाता है, तो बचत, निवेश और जीवन स्तर सुधारने के अवसर सिमट जाते हैं। इस प्रकार आर्थिक अंतर केवल आय का अंतर नहीं रहता, बल्कि अवसरों की खाई भी बन जाता है।
फिर भी, इन विश्लेषणों में निराशा के साथ-साथ दिशा भी छिपी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि बेहतर भविष्य के लिए केवल आय बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि कौशल विकास, समझदारी से निवेश और संतुलित बजट प्रबंधन आवश्यक है। इसे ही आधुनिक भाषा में “रिच माइंडसेट” कहा जा रहा है — यानी सीमित संसाधनों में भी दूरदृष्टि के साथ योजना बनाना।
अंततः, एंजेल का नियम हमें यह समझाने का माध्यम बनता है कि आर्थिक प्रगति का अर्थ केवल समृद्धि नहीं, बल्कि संतुलन भी है। जब तक समाज के बड़े हिस्से की थाली भरने की चिंता बनी रहेगी, तब तक विकास की तस्वीर अधूरी ही मानी जाएगी।
