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एपस्टीन से अदाणी तक: राहुल के सवालों पर गरमाई दिल्ली की राजनीति

       दिल्ली की सियासी हवा इन दिनों कुछ ज्यादा ही तप्त है। संसद के गलियारों से लेकर सोशल मीडिया के मंच तक, शब्दों के तीर चल रहे हैं। केंद्र में हैं—Rahul Gandhi और Narendra Modi। आरोप और पलटवार की इस कहानी में ‘गंदी राजनीति’ का बयान, एपस्टीन फाइल्स, अदाणी प्रकरण और भारत-अमेरिका ट्रेड डील जैसे मुद्दे एक साथ उलझ गए हैं।

       कहानी की शुरुआत उस वक्त हुई जब प्रधानमंत्री ने एक कार्यक्रम में विपक्ष के विरोध को “शर्मनाक” और “गंदी राजनीति” करार दिया। इसके बाद विपक्ष, विशेषकर राहुल गांधी, ने तीखा जवाब दिया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी एक वीडियो में राहुल ने प्रधानमंत्री पर सीधा हमला बोलते हुए कई गंभीर सवाल उठाए।

       राहुल गांधी ने अपने वक्तव्य में तथाकथित “एपस्टीन फाइल्स” का हवाला दिया। उनका दावा था कि इन दस्तावेजों में भारत के शीर्ष नेताओं के नाम सामने आए हैं, जो देश की छवि के लिए चिंताजनक हैं। हालांकि इन फाइल्स में नाम आने को लेकर कोई आधिकारिक या न्यायिक पुष्टि नहीं हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि कई अंतरराष्ट्रीय दस्तावेजों में नाम-ड्रॉपिंग की घटनाएं पहले भी सामने आती रही हैं, जिनका सीधा संबंध अपराध से सिद्ध नहीं होता। भारत सरकार ने भी इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है।

       इस विवाद की दूसरी कड़ी उद्योगपति अदाणी से जुड़े अमेरिकी मामले से जुड़ती है। राहुल गांधी का आरोप है कि अमेरिका में चल रहे घूसखोरी और धोखाधड़ी के आरोपों के बीच केंद्र सरकार की चुप्पी सवाल खड़े करती है। उनका कथन था कि “मोदी और अदाणी एक हैं, तो सुरक्षित हैं।” भाजपा ने इस बयान को राजनीतिक सनसनी फैलाने का प्रयास बताया और कहा कि किसी भी निजी कंपनी के खिलाफ विदेशी जांच को भारत सरकार से जोड़ना अनुचित है।

       तीसरा बड़ा मुद्दा भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर है। राहुल गांधी का आरोप है कि इस समझौते से देश के किसान और कपड़ा उद्योग प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने इसे “देश बेचने” जैसा करार देते हुए कहा कि कांग्रेस “एक इंच भी पीछे नहीं हटेगी।” भाजपा की ओर से जवाब आया कि यह समझौता भारत के निर्यात और रणनीतिक हितों के लिए लाभकारी है।

       इस बहस की पृष्ठभूमि में एक और प्रसंग है—लोकसभा में अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप के उस बयान पर प्रतिक्रिया, जिसमें उन्होंने भारत-पाकिस्तान युद्धविराम को लेकर दावा किया था। मानसून सत्र के दौरान राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री से खुलकर कहने को कहा था कि “ट्रंप झूठ बोल रहे हैं।” प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इस चुनौती का सीधा उल्लेख नहीं किया, जिससे विपक्ष को नया हमला करने का अवसर मिल गया।

       भाजपा की प्रतिक्रिया भी उतनी ही आक्रामक रही। पार्टी प्रवक्ताओं ने राहुल गांधी के आरोपों को “झूठा प्रचार” बताया और कहा कि एपस्टीन फाइल्स में प्रधानमंत्री का कोई प्रमाणित संबंध नहीं है। केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी ने यह स्वीकार किया कि उन्होंने एपस्टीन से कुछ औपचारिक मुलाकातें की थीं, पर किसी भी आपराधिक गतिविधि से संबंध से इंकार किया। भाजपा का कहना है कि विपक्ष अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को धूमिल कर रहा है।

       राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह टकराव केवल शब्दों का नहीं, बल्कि 2026 और आगे के चुनावी समीकरणों का संकेत है। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में किसान और युवा मतदाता अहम भूमिका निभाते हैं। यदि ट्रेड डील और उद्योग से जुड़े मुद्दे जनमानस में गूंजते हैं, तो इसका असर चुनावी रणनीतियों पर पड़ सकता है।

       दूसरी ओर, भाजपा के पास संसद में बहुमत का संबल है। पार्टी का तर्क है कि विकास, बुनियादी ढांचे और वैश्विक कूटनीति में भारत की स्थिति पहले से मजबूत हुई है। प्रधानमंत्री का फोकस एआई, डिजिटल इंडिया और आत्मनिर्भरता जैसे मुद्दों पर है। ऐसे में विपक्ष के आरोपों को भाजपा “ध्यान भटकाने की कोशिश” बता रही है।

       सियासी संघर्ष का यह दौर केवल संसद तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया पर समर्थक और विरोधी अपने-अपने तर्कों के साथ सक्रिय हैं। वीडियो क्लिप्स, पुराने बयान और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स को लेकर बहस जारी है। राजनीतिक संवाद अब पारंपरिक मंचों से आगे बढ़कर डिजिटल अखाड़े में प्रवेश कर चुका है।

       परंतु इस शोर के बीच एक बड़ा प्रश्न खड़ा है—क्या इन आरोप-प्रत्यारोपों से जनता के मूल मुद्दे पीछे छूट रहे हैं? महंगाई, बेरोजगारी, तकनीकी बदलाव और वैश्विक अस्थिरता जैसे प्रश्न भी उतने ही प्रासंगिक हैं। सियासत की आग में ये सवाल कहीं धुएं में तो नहीं खो रहे?

       इतिहास गवाह है कि भारतीय लोकतंत्र में तीखी बहसें नई नहीं हैं। परंतु हर बहस का अंत जनता के फैसले में होता है। राहुल गांधी के पलटवार और भाजपा की प्रतिक्रिया से यह स्पष्ट है कि राजनीतिक ध्रुवीकरण और गहराएगा। विपक्ष को एकजुटता का अवसर मिल सकता है, वहीं भाजपा अपनी संगठित संरचना और बहुमत के बल पर आक्रामक रुख बनाए रखेगी।

       आखिरकार, यह लड़ाई केवल दो नेताओं के बीच नहीं, बल्कि विचारधाराओं और राजनीतिक नैरेटिव्स की है। एक पक्ष पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहा है, तो दूसरा विकास और स्थिरता का दावा कर रहा है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता किस कहानी को अधिक विश्वसनीय मानती है।

       दिल्ली की सर्द हवाओं में सियासत की यह गर्माहट अभी थमने वाली नहीं। शब्दों की इस जंग में कौन विजयी होगा, यह समय बताएगा—पर फिलहाल लोकतंत्र का मंच पूरी तरह सजा हुआ है, और दर्शक दीर्घा में बैठी जनता हर संवाद, हर आरोप और हर जवाब को ध्यान से सुन रही है।

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