नक्सल मुद्दे पर बढ़ी सियासी तकरार, भूपेश बघेल का अमित शाह पर तीखा पलटवार

रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजनीति में नक्सल मुद्दे को लेकर एक बार फिर जबरदस्त बयानबाज़ी तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के हालिया बयान पर तीखा हमला बोलते हुए उसे “सरासर झूठ” करार दिया है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब लोकसभा में अमित शाह ने दावा किया कि पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान नक्सलियों को संरक्षण मिला।
भूपेश बघेल ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट के जरिए इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि उनके कार्यकाल (2018-2023) में नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की कई बैठकें हुईं, जिनमें मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक भी शामिल रहे। उन्होंने सवाल उठाया कि इन बैठकों में केंद्र सरकार ने कभी यह आरोप क्यों नहीं लगाया कि राज्य नक्सलियों को बचा रहा है।
बघेल ने सीधे तौर पर अमित शाह को चुनौती देते हुए कहा, “अगर हमारी सरकार की कार्रवाई पर केंद्र सरकार की कोई आपत्ति थी, तो उसका प्रमाण सार्वजनिक करें।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर उस समय कोई आपत्ति नहीं थी, तो अब ऐसे आरोप क्यों लगाए जा रहे हैं।
राजनीति मत कीजिए, सच्चाई सामने रखिए
पूर्व मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार पर नक्सल मुद्दे का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “आप नक्सलियों से लड़ रहे हैं, तो हम भी उनसे लड़ रहे थे। अपनी पीठ जरूर थपथपाइए, लेकिन हमारी पीठ पर पैर रखकर ऊपर उठने की कोशिश मत कीजिए।”
बघेल ने खास तौर पर बस्तर क्षेत्र में अपनी सरकार द्वारा स्थापित पुलिस कैंपों का जिक्र किया और दावा किया कि इन्हीं कैंपों की वजह से आज के ऑपरेशन संभव हो पाए हैं। उनका कहना है कि अगर उस समय बुनियादी ढांचा तैयार नहीं किया गया होता, तो वर्तमान में चल रही कार्रवाई इतनी प्रभावी नहीं होती।
शाह का दावा और सियासी जवाब
दरअसल, लोकसभा में अमित शाह ने कहा था कि देश में नक्सलवाद लगभग खत्म हो चुका है और 2024 तक इसमें 99% कमी आई है। उन्होंने पिछली सरकारों, खासकर छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार पर नक्सलियों को संरक्षण देने का आरोप लगाया था।
इसी बयान के जवाब में बघेल ने यह सख्त प्रतिक्रिया दी है, जिससे राजनीतिक तापमान और बढ़ गया है।
हमने ज्यादा पीड़ा झेली
बघेल ने भावनात्मक अंदाज में कहा कि कांग्रेस ने नक्सल हिंसा में अपने कई वरिष्ठ नेताओं को खोया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ मामलों की जांच तक नहीं होने दी गई, जिससे सच्चाई सामने नहीं आ सकी।
क्या कहती है जमीनी हकीकत?
विशेषज्ञों के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में नक्सल प्रभाव वाले जिलों की संख्या में कमी आई है और सुरक्षा बलों की पकड़ मजबूत हुई है। हालांकि, इस उपलब्धि का श्रेय किसे जाए—इसी पर सियासत गरमाई हुई है।
नक्सल मुद्दा, जो कभी केवल सुरक्षा और विकास से जुड़ा था, अब खुलकर सियासी अखाड़ा बन चुका है। एक तरफ केंद्र अपनी उपलब्धियां गिना रहा है, तो दूसरी ओर पूर्व राज्य सरकार अपने योगदान को नजरअंदाज करने का आरोप लगा रही है।
आने वाले समय में यह बहस और तेज होने की संभावना है—और सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि नक्सलवाद पर असली जीत किसकी रणनीति से मिली?



