
भारत के सामाजिक इतिहास में देवदासी प्रथा एक ऐसी कुप्रथा रही है, जिसमें कम उम्र की लड़कियों और महिलाओं को धार्मिक परंपरा के नाम पर मंदिरों में देवता को समर्पित किया जाता था। समय के साथ यह प्रथा महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और लैंगिक शोषण का माध्यम बनती गई। इसके खिलाफ सामाजिक सुधारकों, महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और कानूनविदों ने लंबे समय तक संघर्ष किया। कई राज्यों में कानून बनने के बावजूद इस प्रथा से जुड़ी चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं।
1930 के दशक से शुरू हुई कानूनी रोक की प्रक्रिया
देवदासी प्रथा के खिलाफ कानूनी और सामाजिक विरोध की प्रक्रिया एक दिन में नहीं शुरू हुई। दक्षिण भारत में 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में इस प्रथा के खिलाफ आवाजें तेज हुईं। त्रावणकोर रियासत में 1930 के दशक में सुधारात्मक कदम उठाए गए। इसके बाद ब्रिटिश शासन के दौरान बॉम्बे देवदासी संरक्षण अधिनियम, 1934 जैसे कानून सामने आए।
हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों में प्रथा की सामाजिक स्थिति और कानूनी व्यवस्था अलग होने के कारण इसका उन्मूलन एक लंबी प्रक्रिया रही।
डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी बनीं बड़ी आवाज
देवदासी प्रथा के खिलाफ संघर्ष में डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी का नाम बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। वह भारत की शुरुआती महिला चिकित्सकों में से एक थीं और मद्रास विधान परिषद की पहली महिला सदस्यों में शामिल थीं।
उन्होंने देवदासी प्रथा से प्रभावित महिलाओं की स्थिति को करीब से देखा और इसे सामाजिक सुधार का महत्वपूर्ण मुद्दा बनाया। 1920 के दशक में विधान परिषद में पहुंचने के बाद उन्होंने इस प्रथा के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई। वर्ष 1930 में उन्होंने देवदासी प्रथा को समाप्त करने की दिशा में विधायी पहल की।
उस दौर में उन्हें रूढ़िवादी वर्ग के विरोध का भी सामना करना पड़ा। समर्थकों और सुधारवादियों का तर्क था कि किसी भी धार्मिक परंपरा के नाम पर लड़कियों और महिलाओं के अधिकारों का हनन स्वीकार नहीं किया जा सकता।
महात्मा गांधी और ई.वी. रामासामी ‘पेरियार’ जैसे सामाजिक सुधारकों के समर्थन से इस आंदोलन को व्यापक सामाजिक आधार मिला।
1947 में मद्रास में ऐतिहासिक कानून
लंबे सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष के बाद मद्रास देवदासी (समर्पण का प्रतिषेध) अधिनियम, 1947 लागू हुआ। इस कानून ने मद्रास क्षेत्र में लड़कियों को देवदासी के रूप में समर्पित करने की प्रथा पर कानूनी रोक लगाई।
डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी का योगदान केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं था। उन्होंने प्रभावित महिलाओं और बच्चों के पुनर्वास तथा शिक्षा के लिए भी काम किया। चेन्नई में अव्वई इल्लम (Avvai Illam) जैसी पहल इसी व्यापक सामाजिक सुधार दृष्टिकोण का हिस्सा थी।
क्या 1988 में पूरे देश में एक ही कानून से प्रतिबंध लगा?
देवदासी प्रथा के इतिहास में 1988 का उल्लेख अक्सर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध के रूप में किया जाता है, लेकिन इसे एक केंद्रीय कानून द्वारा पूरे देश में एक साथ प्रतिबंधित किए जाने के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा। वास्तव में इस प्रथा पर कानूनी रोक मुख्य रूप से राज्य-स्तरीय कानूनों के माध्यम से लागू हुई।
कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों ने अपने-अपने कानून बनाकर देवदासी समर्पण पर रोक लगाई। इसलिए भारत में इस प्रथा का कानूनी उन्मूलन एक क्रमिक और राज्यवार प्रक्रिया रही।
कर्नाटक में कड़ा कानून
कर्नाटक में देवदासी प्रथा के खिलाफ कर्नाटक देवदासी समर्पण प्रतिषेध अधिनियम, 1982 महत्वपूर्ण कानून है। इसका उद्देश्य महिलाओं को देवदासी के रूप में समर्पित किए जाने पर रोक लगाना और ऐसा करने वाले लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करना था।
कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ कर्नाटक में पूर्व देवदासी महिलाओं के पुनर्वास के लिए पेंशन, आवास, शिक्षा और आजीविका से जुड़ी योजनाएं भी समय-समय पर चलाई गई हैं। हालांकि इन योजनाओं की राशि और पात्रता समय के साथ बदल सकती है, इसलिए किसी विशेष वर्तमान राशि को सरकारी स्रोत से सत्यापित करना जरूरी है।
आंध्र प्रदेश में भी कानूनी रोक
अविभाजित आंध्र प्रदेश में 1988 का देवदासी समर्पण प्रतिषेध कानून महत्वपूर्ण कदम रहा। इसका उद्देश्य लड़कियों को धार्मिक परंपरा के नाम पर समर्पित करने की प्रक्रिया में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई करना था।
इसके साथ प्रभावित महिलाओं के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता, कौशल विकास और पुनर्वास से संबंधित प्रयास भी किए गए। सिलाई, हस्तशिल्प और अन्य स्वरोजगार गतिविधियों के जरिए महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने पर जोर दिया गया।
महाराष्ट्र में भी उठे सख्त कदम
महाराष्ट्र में भी देवदासी प्रथा के विभिन्न स्थानीय स्वरूपों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई। महाराष्ट्र देवदासी प्रथा उन्मूलन अधिनियम, 2006 इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम था।
राज्य में पुनर्वास और सामाजिक सुरक्षा के लिए विभिन्न योजनाओं के माध्यम से प्रभावित महिलाओं को मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश की गई। बच्चों की शिक्षा और सरकारी दस्तावेजों तक पहुंच जैसे मुद्दों को भी पुनर्वास प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया।
सिर्फ कानून बनाना पर्याप्त नहीं
देवदासी प्रथा पर कानून बनने के बावजूद चुनौती पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। कुछ क्षेत्रों में सामाजिक दबाव, गरीबी, अशिक्षा, अंधविश्वास और पारंपरिक मान्यताओं के कारण इस तरह की घटनाओं की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं।
इसी वजह से विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानूनी कार्रवाई से इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। प्रभावित महिलाओं को शिक्षा, सुरक्षित आवास, रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाएं, आर्थिक सहायता और सामाजिक सम्मान उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका
देवदासी प्रथा से जुड़े मामलों में न्यायपालिका ने भी समय-समय पर राज्यों को प्रभावित महिलाओं की पहचान, संरक्षण और पुनर्वास की दिशा में कदम उठाने पर जोर दिया है। राष्ट्रीय महिला आयोग सहित विभिन्न संस्थाएं भी महिलाओं के अधिकारों और पुनर्वास से जुड़े मुद्दों को उठाती रही हैं।
आज देवदासी प्रथा कानूनन स्वीकार्य नहीं है। फिर भी यदि कहीं इस तरह की परंपरा के नाम पर किसी लड़की या महिला को समर्पित किए जाने की कोशिश होती है, तो यह गंभीर मानवाधिकार और महिला अधिकार का मुद्दा बन जाता है।
डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी की विरासत
देवदासी प्रथा के खिलाफ डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी का संघर्ष इस बात का उदाहरण है कि सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने के लिए कानून के साथ सामाजिक जागरूकता और पुनर्वास भी जरूरी है। उन्होंने महिलाओं को केवल पीड़ित के रूप में देखने के बजाय उन्हें शिक्षा, सम्मान और आत्मनिर्भरता देने की दिशा में काम किया।
देवदासी प्रथा का इतिहास इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि किसी सामाजिक कुप्रथा को खत्म करने में कानून बनाने के साथ-साथ समाज की सोच बदलना भी उतना ही जरूरी है। कानूनी प्रतिबंध के दशकों बाद भी असली सफलता तभी मानी जाएगी, जब किसी लड़की को गरीबी, अंधविश्वास या सामाजिक दबाव के कारण ऐसी प्रथा में धकेला न जा सके और प्रभावित महिलाओं को सम्मानजनक जीवन का पूरा अवसर मिले।



