पहलगाम आतंकी हमला: भारत-पाक संबंधों की तल्ख़ी और नीति के विकल्पों पर बहस


नई दिल्ली
लेखक: विशेष संवाददाता
22 अप्रैल, 2025 को जम्मू-कश्मीर के पर्यटन क्षेत्र पहलगाम में हुए घातक आतंकी हमले ने एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के संबंधों को तनावपूर्ण मोड़ पर ला खड़ा किया है। इस हमले में 11 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए और कई अन्य गंभीर रूप से घायल हुए हैं। प्रारंभिक रिपोर्टों और खुफिया सूत्रों से संकेत मिलता है कि इस हमले के तार एक पाकिस्तान-प्रेरित आतंकी संगठन से जुड़े हो सकते हैं। इस हमले ने न केवल सुरक्षा चिंताओं को जन्म दिया है, बल्कि एक बार फिर यह बहस शुरू कर दी है कि भारत को पाकिस्तान के प्रति कैसी रणनीति अपनानी चाहिए — कूटनीतिक, सैन्य या संयम की।
घटना की प्रकृति और प्रारंभिक जानकारी
हमला पहलगाम के पास, एक गश्त कर रही सुरक्षाबलों की टुकड़ी पर सुनियोजित तरीके से किया गया। जिस स्थान पर हमला हुआ वह आमतौर पर पर्यटकों के लिए सुरक्षित माना जाता है, जिससे यह और भी चिंता का विषय बन जाता है। सुरक्षाबलों द्वारा जवाबी कार्रवाई की गई, लेकिन घात लगाकर किए गए इस हमले में भारी नुकसान हुआ।
गृह मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, हमले में प्रयुक्त हथियारों और संचार के तरीकों से यह संदेह मज़बूत हुआ है कि इसमें पाकिस्तान की भूमिका या उसके प्रायोजित आतंकी गुट शामिल हैं।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं: समर्थन और संयम
हमले के बाद अमेरिका, फ्रांस, इज़राइल, और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने भारत के साथ एकजुटता दर्शाई। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा, “भारत को अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए जो कदम आवश्यक हों, उठाने का पूरा अधिकार है।” इज़राइल ने इस हमले को “नरसंहार” की संज्ञा दी और आतंकवाद के खिलाफ भारत की हर कार्यवाही को समर्थन देने की बात कही।
हालाँकि, संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने एक अलग स्वर अपनाते हुए दोनों देशों से “शांति और संवाद” का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि “दक्षिण एशिया की स्थिरता विश्व शांति के लिए आवश्यक है, और दोनों परमाणु शक्तियाँ वार्ता के रास्ते पर लौटें।”
भारतीय राजनीतिक परिदृश्य: आक्रोश और रणनीतिक दुविधा
घटना के बाद भारतीय राजनीति में तीव्र प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं।
सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कई नेताओं ने इसे भारत की संप्रभुता पर सीधा हमला बताते हुए “मुँहतोड़ जवाब” की मांग की है। रक्षा मंत्री ने कहा, “यह हमला केवल सैनिकों पर नहीं, राष्ट्र की आत्मा पर हमला है।” साथ ही, प्रधानमंत्री कार्यालय ने संकेत दिए हैं कि सभी विकल्पों पर गंभीरता से विचार हो रहा है।
विपक्षी दलों में इस मुद्दे पर दोहरी प्रतिक्रिया देखी जा रही है। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, और तेलंगाना भारत राष्ट्र समिति जैसे दलों ने हमले की निंदा करते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की है, वहीं वाम दलों और कुछ क्षेत्रीय नेताओं ने युद्ध के बजाय अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने की नीति अपनाने की बात कही है।
सोशल मीडिया: गुस्सा, भावनाएं और ट्रेंड
घटना के बाद सोशल मीडिया पर राष्ट्रीय आक्रोश साफ तौर पर देखने को मिला।
#SurgicalStrikeAgain, #JusticeForSoldiers, और #RevengeForPahalgam जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। बड़ी संख्या में नागरिकों ने सरकार से सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक, या प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई की मांग की।
हालाँकि एक तबका ऐसा भी है जो शांति और रणनीतिक संयम की अपील कर रहा है। उनका कहना है कि युद्ध केवल क्षणिक संतोष देगा, लेकिन दीर्घकालीन समाधान नहीं।
क्या सैन्य विकल्प ही एकमात्र रास्ता है?
इस सवाल का उत्तर देना आसान नहीं।
सुरक्षा मामलों के विश्लेषक मेजर जनरल (से.नि.) अशोक मेहता के अनुसार, “सीमित सैन्य कार्रवाई या सर्जिकल स्ट्राइक एक स्पष्ट संदेश देती है, परंतु यह आतंकवाद की जड़ों को समाप्त नहीं कर सकती।”
वहीं, राजनयिकों का मानना है कि पाकिस्तान को आर्थिक, कूटनीतिक और वैश्विक मंचों पर अलग-थलग करने की नीति ज़्यादा प्रभावी और टिकाऊ होगी।
कुछ रणनीतिक विशेषज्ञ यह भी कह रहे हैं कि “चुप्पी ही कमजोरी का संकेत बनती है”, और भारत को एक नीति आधारित आक्रामकता (Policy-Based Aggression) अपनानी चाहिए।
राजनीति बनाम रणनीति
यह भी देखना ज़रूरी है कि आतंकी हमले जैसी संवेदनशील घटनाएं अक्सर चुनावी राजनीति का विषय बन जाती हैं।
सरकार पर राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर दबाव बढ़ता है, और सत्तारूढ़ दलों के लिए यह खुद को ‘राष्ट्रवादी ताकत’ के रूप में प्रस्तुत करने का अवसर भी बनता है।
हालांकि, नीति निर्धारण को आक्रोश या लोकप्रिय दबाव के बजाय, तथ्यों, रणनीति और दीर्घकालीन सुरक्षा दृष्टिकोण के आधार पर तय किया जाना चाहिए।
भविष्य की राह: निर्णय की घड़ी
पहलगाम हमला एक सामान्य आतंकी घटना नहीं, बल्कि एक रणनीतिक मोड़ है।
भारत को अब तय करना होगा कि:
क्या वह एक और सर्जिकल स्ट्राइक या एयर स्ट्राइक जैसा सैन्य विकल्प चुने?
या वह राजनयिक, आर्थिक और तकनीकी उपायों से पाकिस्तान पर बहुआयामी दबाव बनाए?
या दोनों को संतुलित रूप से मिलाकर “स्मार्ट स्ट्रेटजी” अपनाए?
इसके साथ ही, भारत को अपनी आंतरिक सुरक्षा, खुफिया प्रणाली और सीमा प्रबंधन को और मज़बूत करने की आवश्यकता है।
निष्कर्ष: संयम, साहस और संतुलन का समय
पहलगाम का हमला सिर्फ़ सुरक्षा बलों पर नहीं, बल्कि पूरे भारत की राष्ट्रीय चेतना पर हमला है। इससे उपजा ग़ुस्सा स्वाभाविक है, लेकिन उसका उत्तर रणनीतिक समझदारी से ही दिया जा सकता है। भारत को ऐसा रास्ता चुनना होगा जो उसकी सार्वभौमिकता की रक्षा करे, साथ ही क्षेत्रीय स्थायित्व को भी खतरे में न डाले।
यह निर्णय न केवल आने वाले दिनों की नीति तय करेगा, बल्कि भारत की वैश्विक छवि और सुरक्षा भविष्य का दिशा-निर्धारण भी करेगा।



