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जुमलों का मायाजाल या 2047 की नींव? बजट पर छिड़ी जबरदस्त सियासी जंग

      रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा में जब वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने 1.72 लाख करोड़ रुपये का बजट पेश किया, तो सदन में तालियों और ठहाकों के बीच एक नई बहस जन्म ले चुकी थी। ‘संकल्प’ थीम पर आधारित यह बजट, सरकार के अनुसार, ‘विकसित छत्तीसगढ़ 2047’ की बुनियाद है। मगर विपक्ष का दावा है—यह संकल्प नहीं, शब्दों का मायाजाल है।

      मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इसे भविष्य की ठोस रूपरेखा बताया। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इसे “चैट-जीपीटी बजट” कहकर तंज कसा। नेता प्रतिपक्ष चरण दास महंत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने भी तीखे सवाल उठाए।

      तो आखिर इस बजट में ऐसा क्या है, जिसने सियासी तापमान बढ़ा दिया?

सवाल 1: क्या यह बजट सच में ‘विकसित छत्तीसगढ़ 2047’ की नींव है?

सरकार का जवाब:

      वित्त मंत्री का कहना है कि यह बजट सिर्फ आंकड़ों का पुलिंदा नहीं, बल्कि विज़न डॉक्यूमेंट है। महिलाओं के लिए रानी दुर्गावती योजना, किसानों और युवा उद्यमियों के लिए ब्याज-मुक्त ऋण, शिक्षा-स्वास्थ्य और अधोसंरचना पर बढ़ा निवेश—ये सब राज्य को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कदम हैं।

      मुख्यमंत्री साय के शब्दों में, “यह बजट संकल्प से सिद्धि की ओर बढ़ने का मार्ग है।”

विपक्ष का प्रतिप्रश्न:

      कांग्रेस का सवाल है—पिछले वादों का क्या हुआ? क्या पहले घोषित योजनाओं का पूरा क्रियान्वयन हुआ? उनका आरोप है कि बड़ी घोषणाएं तो हैं, लेकिन ठोस रोडमैप और समयसीमा का अभाव है। “2047 की बात करने से पहले 2026 की हकीकत देखिए,” विपक्ष तंज कसता है।

सवाल 2: महिलाओं और युवाओं को क्या सच में सशक्तिकरण मिलेगा?

सरकार का दावा:

      रानी दुर्गावती योजना के तहत आर्थिक सहायता और कौशल विकास पर जोर दिया गया है। महिलाओं को स्वरोजगार और उद्यमिता से जोड़ने की बात कही गई है। युवाओं के लिए सस्ता ऋण और स्टार्टअप प्रोत्साहन का प्रावधान है।

      व्यापारिक संगठनों और महिला समूहों ने इसे सकारात्मक कदम बताया है। उनका कहना है कि इससे आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।

विपक्ष की शंका:

      कांग्रेस नेताओं का कहना है कि बजट में आवंटन पर्याप्त नहीं है। “योजनाओं के नाम बड़े हैं, लेकिन धनराशि कम है,” विपक्ष का आरोप है। उनका दावा है कि यह घोषणाएं चुनावी सालों में सुनने को मिलने वाले जुमलों जैसी हैं।

सवाल 3: किसानों के लिए राहत या सिर्फ आश्वासन?

सरकार की बात:

      ब्याज-मुक्त ऋण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल देने के लिए विशेष पैकेज की घोषणा की गई है। सरकार का कहना है कि इससे कृषि क्षेत्र में नई ऊर्जा आएगी और ग्रामीण आय बढ़ेगी।

विपक्ष का तर्क:

      कांग्रेस पूछती है—क्या न्यूनतम समर्थन मूल्य और फसल बीमा जैसे मुद्दों पर ठोस कदम हैं? उनका आरोप है कि किसानों की वास्तविक समस्याओं—सिंचाई, बिजली, बाजार—पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।

सवाल 4: क्या यह बजट उद्योगपतियों के पक्ष में है?

विपक्ष का आरोप:

      दीपक बैज ने इसे “उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने वाला” बजट बताया। उनका कहना है कि आम आदमी और गरीब वर्ग के लिए सीधी राहत कम है।

सरकार का जवाब:

      सरकार का कहना है कि निवेश और उद्योग बढ़ेंगे तो रोजगार सृजित होंगे। “अगर उद्योग मजबूत होगा, तभी रोजगार और आय बढ़ेगी,” वित्त मंत्री का तर्क है।

सवाल 5: ‘चैट-जीपीटी बजट’ का तंज कितना सार्थक?

      भूपेश बघेल का यह बयान राजनीतिक हलकों में खूब चर्चा में रहा। उनका कहना है कि बजट में जमीनी समझ का अभाव है और यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लिखे दस्तावेज जैसा है—सुंदर शब्द, लेकिन ठोस भावना नहीं।

      सरकार ने इसे “गंभीर दस्तावेज का मजाक” बताते हुए खारिज किया। भाजपा नेताओं का कहना है कि विपक्ष के पास रचनात्मक सुझाव नहीं, इसलिए व्यंग्य का सहारा लिया जा रहा है।

जनता की नजर से: उम्मीदें और आशंकाएं

      सदन की बहस से बाहर, असली परीक्षा जनता के बीच है। महिला स्वयं सहायता समूहों में उम्मीद है कि नई योजना उन्हें आर्थिक ताकत देगी। युवा उद्यमी सस्ते ऋण की घोषणा से उत्साहित हैं।

      लेकिन ग्रामीण इलाकों में सवाल भी हैं—क्या कागज पर लिखी योजनाएं जमीन तक पहुंचेंगी? क्या प्रक्रिया सरल होगी या फिर कागजी खानापूर्ति में उलझ जाएगी?

आर्थिक संतुलन का सवाल

      1.72 लाख करोड़ रुपये का यह बजट आकार में बड़ा है। लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि असली चुनौती राजस्व और व्यय संतुलन की है। अगर आय के स्रोत मजबूत नहीं हुए, तो कर्ज का बोझ बढ़ सकता है।

      सरकार का दावा है कि राजस्व संग्रह में सुधार और निवेश आकर्षित करने से संतुलन बना रहेगा। विपक्ष को आशंका है कि बड़े वादे भविष्य में वित्तीय दबाव बन सकते हैं।

राजनीतिक असर

      यह बजट केवल आर्थिक दस्तावेज नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी है। भाजपा इसे अपने विज़न और स्थिरता का प्रमाण बता रही है। कांग्रेस इसे जुमलों का पुलिंदा कहकर जनता के बीच सवाल उठा रही है।

      विश्लेषकों का मानना है कि यदि योजनाओं का क्रियान्वयन तेज और पारदर्शी रहा, तो सरकार को लाभ मिल सकता है। लेकिन यदि वादे अधूरे रह गए, तो विपक्ष को मुद्दा मिलेगा।

निष्कर्ष: संकल्प की परीक्षा

      छत्तीसगढ़ का यह बजट एक ऐसी किताब की तरह है, जिसके पन्नों पर उम्मीद और आशंका दोनों लिखी हैं। सरकार इसे भविष्य की रोशनी कह रही है, विपक्ष इसे धुंध।

      सवालों और जवाबों की इस जंग में अंतिम फैसला जनता करेगी। क्या ‘संकल्प’ सच में सिद्धि बनेगा, या फिर यह भी सियासी इतिहास के पन्नों में एक और बहस बनकर रह जाएगा?

      फिलहाल इतना तय है—छत्तीसगढ़ की राजनीति में बजट 2026-27 केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि बहस का केंद्र बन चुका है। और इस बहस की गूंज आने वाले महीनों तक सुनाई देती रहेगी।

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