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बिहार चुनाव से पहले 75 लाख महिलाओं को 10-10 हजार रुपये, जनता की मिली-जुली प्रतिक्रिया – चुनावी चाल या महिला सशक्तिकरण का बड़ा कदम?

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Raphael Thomas (Managing Edirector)

चुनावी समीकरण – महिला वोटर बनेंगी बिहार की राजनीति की निर्णायक शक्ति

सरकार का दावा – स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता की दिशा में ऐतिहासिक कदम

महिलाओं की राय – स्वरोजगार से लेकर बच्चों की पढ़ाई तक खर्च की योजना

विपक्ष का हमला – ‘वन टाइम पेमेंट’, रेवड़ी पॉलिटिक्स और चुनावी जुमला

       पटना। बिहार चुनाव से पहले 75 लाख महिलाओं को 10-10 हजार रुपये की आर्थिक सहायता ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में हलचल मचा दी है।

       जनता की प्रतिक्रिया मिश्रित है। लाभार्थी महिलाएँ इसे रोजगार व घरेलू खर्च में सहायक मान रही हैं। कई महिलाएँ सिलाई-कढ़ाई, बकरी पालन, कृषि व छोटे व्यवसाय में इसे लगाने का इरादा रखती हैं, जबकि कुछ इसे बच्चों की पढ़ाई व स्वास्थ्य खर्च में उपयोग करना चाहती हैं। परंतु एक वर्ग इसे एकमुश्त और अस्थायी मदद मानकर सवाल उठा रहा है।

       सरकारी पक्ष का कहना है कि यह महिला सशक्तिकरण का सबसे बड़ा प्रयास है। सरकार का दावा है कि सफल महिलाओं को आगे 2 लाख रुपये तक की अतिरिक्त सहायता मिलेगी।

       वहीं, विपक्ष ने इसे “रेवड़ी पॉलिटिक्स” और चुनावी गिमिक बताया है। कांग्रेस और आरजेडी नेताओं ने इसे स्थायी योजना की बजाय वोट बैंक साधने का हथकंडा करार दिया।

       राजनीतिक असर को लेकर विश्लेषकों का मानना है कि महिला वोटर बिहार चुनाव में निर्णायक साबित होंगी। यह योजना महिलाओं के लिए राहत और अवसर दोनों देती है, लेकिन इसकी टाइमिंग ने इसे चुनावी रंग दे दिया है।

जनता की प्रतिक्रिया : उत्साह और संदेह दोनों

       इस योजना को लेकर बिहार की महिलाओं में भारी उत्साह देखा जा रहा है। बड़ी संख्या में महिलाएँ बैंक पहुँचकर अपने खातों में जमा हुई राशि की जानकारी ले रही हैं। लाभार्थियों का कहना है कि यह पैसा उन्हें रोजगार शुरू करने और घर की आमदनी बढ़ाने में मदद करेगा।

  • कई महिलाओं ने कहा कि वे इस पैसे से सिलाई-कढ़ाई, बुनाई, हस्तशिल्प और छोटे स्तर पर किराना दुकान या सब्जी व्यापार शुरू करेंगी।

  • कुछ महिलाएँ इसे बकरी पालन, दुग्ध व्यवसाय या कृषि कार्य में लगाने का इरादा रखती हैं।

  • वहीं, कुछ महिलाओं ने साफ कहा कि वे इस धन का उपयोग बच्चों की पढ़ाई, घर की मरम्मत और स्वास्थ्य खर्च पर करेंगी।

       हालाँकि, एक बड़ा वर्ग यह सवाल भी पूछ रहा है कि यह योजना स्थायी है या केवल चुनाव तक सीमित। कई महिलाओं ने कहा कि अगर यह राशि हर महीने या सालाना मिलती तो ज्यादा मददगार होती, लेकिन केवल एक बार मिलने से इसका असर सीमित हो जाएगा।

सरकारी पक्ष : ‘महिला वोटर’ साधने का गेमचेंजर

       राज्य और केंद्र सरकार इस योजना को चुनावी राजनीति से जोड़ने के आरोपों से इनकार करते हुए कह रही है कि यह कदम महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़ा सुधार है।

       प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दोनों ने अपने भाषणों में इसे “महिला सशक्तिकरण का सबसे बड़ा प्रयास” बताया। सरकार का दावा है कि :

  • इस योजना के माध्यम से महिलाएँ स्वरोजगार, हथकरघा, पशुपालन और कृषि क्षेत्र में योगदान देंगी।

  • योजना केवल आर्थिक सहायता नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव और महिला नेतृत्व निर्माण का भी हिस्सा है।

  • पहली किस्त के 6 महीने बाद यदि कोई महिला स्वरोजगार में सफल दिखती है, तो उसे 2 लाख रुपये तक की अतिरिक्त मदद भी मिल सकती है।

       सरकारी सूत्रों का कहना है कि योजना की मॉनिटरिंग महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से होगी और महिलाओं के उत्पादों के लिए ग्रामीण बाज़ारों को भी मजबूत किया जाएगा।

विपक्ष और स्थानीय नेताओं की प्रतिक्रिया : ‘रेवड़ी पॉलिटिक्स’

       इस योजना ने विपक्षी खेमे को सरकार पर हमला करने का नया मौका दे दिया है।

  • कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इसे ‘वन टाइम पेमेंट’ कहकर चुनावी छलावा बताया। उन्होंने कहा कि कर्नाटक की गृहलक्ष्मी योजना की तरह लगातार मासिक आर्थिक मदद दी जानी चाहिए, न कि चुनाव से पहले एकमुश्त राशि।

  • प्रियंका गांधी ने सवाल उठाया कि 20 साल से ऐसी योजना क्यों नहीं चली और चुनाव के समय अचानक क्यों लाई गई? उन्होंने इसे सीधा “चुनावी जुमला” करार दिया।

  • आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया कि यह योजना दरअसल उनकी पार्टी की ‘माई-बहन मान योजना’ की कॉपी है, जिसमें मासिक पेंशन और अन्य सुविधाओं का वादा पहले ही किया गया था।

  • विपक्षी दलों का कहना है कि यह योजना महिलाओं को स्थायी आर्थिक स्वतंत्रता नहीं देगी बल्कि केवल चुनावी ‘गिम्मिक’ है।

       स्थानीय स्तर पर भी कई नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार वोटरों को प्रभावित करने के लिए अस्थायी लाभ बाँट रही है, जबकि दीर्घकालिक योजनाएँ लागू करने की बजाय केवल तात्कालिक घोषणाएँ की जा रही हैं।

लाभार्थियों की प्राथमिकताएँ : स्वरोजगार और घरेलू खर्च

       महिलाओं ने स्पष्ट किया है कि 10 हजार रुपये की राशि उन्हें रोजगार और छोटे कारोबार शुरू करने में मददगार होगी।

  • ग्रामीण महिलाएँ इसे पशुपालन, बकरी पालन और खेती में निवेश करना चाहती हैं।

  • शहरी क्षेत्र की महिलाएँ सिलाई-कढ़ाई, टेलरिंग, किराना दुकान और अन्य छोटे व्यवसाय शुरू करने का मन बना रही हैं।

  • कुछ महिलाएँ इसे बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च करना चाहती हैं।

       सरकारी नियम महिलाओं को पैसे के उपयोग में स्वतंत्रता देते हैं। यानी, वे इसे स्वरोजगार के साथ-साथ घर-परिवार की ज़रूरतों पर भी खर्च कर सकती हैं।

वित्तीय स्रोत और बजट का ढाँचा

       इस योजना को लागू करने के लिए बिहार सरकार ने 7,500 करोड़ रुपये का बजट तैयार किया है।

  • मुख्य स्रोत राज्य सरकार का महिला और बाल विकास विभाग है।

  • केंद्र सरकार से मिलने वाले महिला विकास और ग्रामीण विकास अनुदान भी इसमें शामिल हैं।

  • योजना को लागू करने के लिए पंचायत और स्वयं सहायता समूहों की मदद ली जा रही है।

  • राशि सीधे महिलाओं के बैंक खाते में Direct Benefit Transfer (DBT) के ज़रिए भेजी जा रही है, ताकि बीच में कोई गड़बड़ी न हो।

       इसके अलावा, स्वरोजगार में सफल महिलाओं को आगे 2 लाख रुपये तक की अतिरिक्त मदद देने का प्रावधान भी रखा गया है।

चुनावी असर : महिला वोटर बनेंगी निर्णायक शक्ति

       बिहार की राजनीति में महिलाओं का वोट बैंक हमेशा से निर्णायक माना जाता रहा है।

  • 2015 और 2020 के चुनावों में महिला वोटिंग प्रतिशत पुरुषों से ज्यादा रहा था।

  • राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 75 लाख महिलाओं को सीधे आर्थिक सहायता देना निश्चित रूप से चुनावी समीकरण को प्रभावित करेगा।

       विपक्ष इसे “महिला वोटर को साधने की चुनावी चाल” कह रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे “महिला सशक्तिकरण का नया अध्याय” बता रहा है।

निष्कर्ष : चुनावी चाल और महिला सशक्तिकरण के बीच संतुलन

       बिहार की मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना निस्संदेह एक महत्वाकांक्षी योजना है, जिसने महिलाओं को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता दी है। इससे लाखों महिलाएँ स्वरोजगार और छोटे कारोबार की दिशा में कदम बढ़ा सकती हैं।

       हालाँकि, इस योजना की टाइमिंग (चुनाव से पहले) ने इसे पूरी तरह चुनावी रंग में रंग दिया है।

  • समर्थक इसे “महिला सशक्तिकरण का गेमचेंजर” मान रहे हैं।

  • विपक्ष इसे “रेवड़ी पॉलिटिक्स और वन टाइम पेमेंट” कह रहा है।

       अंततः, यह तय करना जनता और खासकर बिहार की महिलाएँ ही करेंगी कि यह योजना उनके जीवन में वास्तविक बदलाव लाती है या केवल चुनावी मौसम की एक तात्कालिक ‘भेंट’ साबित होती है।

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