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स्पीकर ओम बिरला पर अविश्वास की आहट! सियासी अटकलें तेज

विपक्ष के आरोप, INDIA गठबंधन की रणनीति और संसदीय प्रक्रिया पर विस्तृत रिपोर्ट

1. विवाद की पृष्ठभूमि

लोकसभा में विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस और INDIA गठबंधन के घटक दल, इन दिनों लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की भूमिका को लेकर लगातार नाराज़गी जता रहे हैं। यह विवाद उस समय और गहरा गया जब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के हालिया भाषण के दौरान सदन में भारी हंगामा हुआ और विपक्ष का आरोप है कि उन्हें अपनी बात पूरी रखने का अवसर नहीं दिया गया। इसके बाद से संसद की कार्यवाही बार-बार बाधित होती रही है और राजनीतिक माहौल लगातार गर्म बना हुआ है।

2. विपक्ष का मुख्य आरोप: निष्पक्षता पर सवाल

विपक्ष का कहना है कि लोकसभा अध्यक्ष का संवैधानिक दायित्व सदन को निष्पक्ष और संतुलित ढंग से चलाना होता है, लेकिन हाल के सत्रों में उनका रवैया सत्तापक्ष के प्रति अधिक सहानुभूतिपूर्ण और विपक्ष के प्रति कठोर रहा है।

आरोप लगाया जा रहा है कि:

  • विपक्षी सांसदों को बोलने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया

  • नेता प्रतिपक्ष के भाषण बार-बार रोके गए

  • संदर्भों और उद्धरणों (जैसे पुस्तकों या दस्तावेज़ों) को कार्यवाही से हटाया गया

  • हंगामे को आधार बनाकर चर्चा समाप्त कर दी गई

3. अविश्वास प्रस्ताव की अटकलें क्यों तेज हुईं

सूत्रों के अनुसार, विपक्ष अब इस मुद्दे को केवल विरोध तक सीमित नहीं रखना चाहता। INDIA गठबंधन के भीतर यह राय उभरकर सामने आई है कि लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव या “हटाने का प्रस्ताव” लाकर एक सशक्त राजनीतिक और संसदीय संदेश दिया जाए।
हालांकि यह भी साफ किया जा रहा है कि यह कदम सरकार गिराने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि संसदीय निष्पक्षता और लोकतांत्रिक परंपराओं की रक्षा के प्रतीकात्मक विरोध के तौर पर देखा जा रहा है।

4. INDIA गठबंधन की बैठक में क्या तय हुआ

बजट सत्र के दौरान हुई INDIA गठबंधन की बैठकों में तीन प्रमुख बिंदुओं पर सहमति बनी:

  1. बजट 2026-27 पर आक्रामक बहस – महंगाई, बेरोज़गारी, किसानों, श्रमिकों और व्यापार समझौतों जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरना।

  2. संसदीय अधिकारों पर जोर – विपक्ष को बोलने का पूरा मौका मिले, यह मांग लगातार उठाई जाए।

  3. स्पीकर की भूमिका पर दबाव – नियमों के तहत अध्यक्ष से निष्पक्षता सुनिश्चित करने की मांग, साथ ही सभी विकल्प खुले रखने की रणनीति।

5. अविश्वास प्रस्ताव की संवैधानिक प्रक्रिया

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94 के तहत लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया तय है।
मुख्य प्रावधान इस प्रकार हैं:

  • अध्यक्ष को केवल लोकसभा द्वारा पारित प्रस्ताव से हटाया जा सकता है

  • प्रस्ताव के लिए कम से कम 14 दिन का पूर्व नोटिस अनिवार्य है

  • प्रस्ताव को पारित करने के लिए लोकसभा की कुल सदस्य संख्या (543) का बहुमत, यानी कम से कम 272 सांसदों का समर्थन आवश्यक होता है

  • यह सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव से अधिक कठोर प्रक्रिया है

6. संख्याबल और प्रस्ताव के पास होने की संभावना

वर्तमान लोकसभा में NDA के पास लगभग 300 से अधिक सांसद बताए जाते हैं, जबकि INDIA गठबंधन और अन्य विपक्षी दल संख्या के लिहाज से कम हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि:

  • विपक्ष के पास प्रस्ताव पारित कराने के लिए आवश्यक संख्या नहीं है

  • NDA का सेफ मार्जिन काफी मजबूत है

  • इसलिए यह प्रस्ताव पास होने की संभावना बहुत कम है

यही कारण है कि इसे अधिकतर विश्लेषक “प्रतीकात्मक राजनीतिक विरोध” मान रहे हैं।

7. विपक्ष के अन्य आरोप

ओम बिरला पर लगाए जा रहे अन्य प्रमुख आरोपों में शामिल हैं:

  • महिला विपक्षी सांसदों को लेकर की गई टिप्पणियों को “अभद्र और अनुचित” बताया जाना

  • प्रधानमंत्री की सदन में अनुपस्थिति को सुरक्षा कारणों से सही ठहराना

  • निलंबन और कार्यवाही रोकने के फैसलों में असंतुलन

विपक्ष का कहना है कि ये सभी घटनाएं मिलकर लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

8. ओम बिरला का संभावित जवाब और रुख

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की ओर से अब तक का रुख संस्थागत और नियम-आधारित रहा है।
संभावित तौर पर उनका जवाब निम्न बिंदुओं पर केंद्रित रहेगा:

  • उन्होंने हमेशा संविधान और लोकसभा नियमों के अनुसार कार्यवाही चलाई है

  • सदन में अनुशासन और सुरक्षा सर्वोपरि है

  • विरोध का अधिकार है, लेकिन कार्यवाही बाधित करना स्वीकार्य नहीं

भाजपा और NDA सांसदों का खुला समर्थन भी यह संकेत देता है कि अध्यक्ष अपनी स्थिति को मजबूत मानते हुए आगे बढ़ेंगे।

9. ऐतिहासिक संदर्भ: पहले भी आ चुके हैं ऐसे प्रस्ताव

भारतीय संसदीय इतिहास में अब तक तीन बार लोकसभा अध्यक्षों के खिलाफ ऐसे प्रस्ताव लाए गए:

  • 1954 में जी. वी. मावलंकर

  • 1966 में सरदार हुकम सिंह

  • 1985 में बलराम जाखड़

तीनों ही मामलों में प्रस्ताव खारिज हुए और अध्यक्ष पद पर बने रहे। यह इतिहास भी दर्शाता है कि ऐसे प्रस्ताव पारित होना बेहद दुर्लभ है।

10. निष्कर्ष: राजनीतिक संदेश या वास्तविक चुनौती?

कुल मिलाकर, ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा संसद और मीडिया दोनों में तेज जरूर है, लेकिन मौजूदा संख्यात्मक और राजनीतिक हालात में इसके पारित होने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है।

       विपक्ष के लिए यह कदम सरकार या अध्यक्ष को हटाने से ज्यादा लोकतांत्रिक असहमति दर्ज कराने और राजनीतिक दबाव बनाने का माध्यम है। वहीं, सत्तापक्ष इसे विपक्ष का प्रतीकात्मक और प्रचारात्मक कदम बता रहा है।

       आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या विपक्ष औपचारिक रूप से नोटिस देता है, और यदि देता है तो संसद का यह टकराव किस दिशा में आगे बढ़ता है।

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