कैंसर फैलता रहा, ऑपरेशन के बजाय आयुर्वेद की खुराक लेता रहा पार्षद, चली गई जान…

- पार्षद चुनाव जीतने के बाद महापौर पद पर भी निर्दलीय चुनाव लड़े। 4 वोट मिला था।
अज़मत अली, भिलाई। भिलाई के जुनवानी खम्हरिया के पार्षद योगेश साहू (Councilor Yogesh Sahu) की मौत ने सबको झकझोर दिया है। यूथ आइकॉन बनने की राह पर चलते-चलते ऐसी गलती कर दी, जिससे जान गंवानी पड़ गई।
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कैंसर (Cancer) ने इतना पांव फैला लिया कि जान बचाई न जा सकी। ऑपरेशन के लिए डाक्टर और दोस्त बोलते रहे, लेकिन पार्षद आयुर्वेद की दवा पर यकीन करता रहा। ऑपरेशन न कराने की वजह से जीभ का कैंसर गले तक पहुंचा और मौत ने उसे निगल लिया।
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सोमवार दोपहर में पार्षद का अंतिम संस्कार कर दिया गया। करीबी दोस्त, सुख-दुख के साथी व रिश्तेदार राहुल साहू ने झकझोरने वाली बातें बयां की। सूचनाजी.कॉम से बातचीत के दौरान कई राज की बातों को भी साझा किया।
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करीब 8 माह पूर्व योगेश साहू के जीभ में कैंसर का लक्षण मिला। गुटखा का सेवन करने की वजह से तकलीफ बढ़ी। जीभ में कैंसर के लक्षण मिले। लेकिन, ऑपरेशन (Operation) के बजाय आयुर्वेद की दवा लेते रहे। हालात बिगड़ते गए और जिंदगी बच न सकी।
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8 माह से कैंसर था। ऑपरेशन (Operation) से डर और चेहरा खराब होने की वजह से वह आयुर्वेद की दवा पर निर्भर हो गए। दो-माह तक आयुर्वेद की दवा खाते रहे। शरीर कमजोर होता गया। अंत में लगा कि ऑपरेशन कराना पड़ेगा, जीभ का संक्रमण फैल चुका था। ट्यूमर को निकाला गया। पता चलने के 3 माह बाद ऑपरेशन कराए। सही होने के बाद फिर तकलीफ बढ़ गई।
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एम्स रायपुर से मिला था जवाब
सेकंड स्टेज में आ गए। जीभ से गले में कैंसर आ गया। कीमो चालू कराए। एम्स रायपुर (AIIMS, Raipur) में गए। वहां से जवाब दे दिया गया। बालको अस्पताल ले जाया गया। वहां कीमो चलता रहा। ऑपरेशन ही एक रास्ता बताया गया। ऑपरेशन से बचने के लिए आयुर्वेदिक के चक्कर में फिर आ गए। लोग समझाते रहे। लेकिन, मानने को तैयार नहीं थे।
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भिलाई टाउनशिप से खम्हरिया और सियासी सफर तक
स्वर्गीय योगेश के साथी बता रहे हैं कि उनके नाना सेक्टर एरिया में रहते थे। बचपन नाना के घर पर ही कटा। सेक्टर 7 स्कूल से पढ़ाई किए। फिर, रुंगटा कॉलेज और सेंट थॉमस कॉलेज से आगे की पढ़ाई की। एमबीए किया।
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लॉकडाउन के समय दोस्तों ने सलाह दिया कि चलो समाज सेवा करते हैं। सेनेटाइजर बांटना शुरू किया। इसी बीच क्रांति सेना में जुड़े। विजय बघेल के यहां भाजपा की सदस्यता ली। लेकिन, पार्टी ने निगम चुनाव में टिकट नहीं दिया। निर्दलीय लड़े। 11 प्रत्याशी थे, उसमें 11वें नंबर पर चुनाव चिह्न था। 780 वोट से जीते। बीजेपी प्रत्याशी राकेश धनकर को हराया।
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पार्षद चुनाव जीतने के बाद महापौर पद पर भी निर्दलीय चुनाव लड़े। 4 वोट मिला था। वैशालीनगर से रिकेश सेन के खिलाफ चुनाव भी लड़ चुके हैं। जोहार छत्तीसगढ़ पार्टी से लड़े थे। तीसरे नंबर पर थे।
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