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रीवां में मिल सकते हैं ऐतिहासिक रहस्य: संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल पहुँचे उत्खनन स्थल

संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने ग्राम रीवां में चल रहे पुरातात्विक उत्खनन स्थल का किया दौरा

       पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने आज रायपुर से लगभग 25 किलोमीटर पूर्व स्थित ग्राम रीवां (रीवांगढ़) में चल रहे पुरातात्विक उत्खनन स्थल का दौरा किया। यहां आयोजित “छत्तीसगढ़ के प्राचीन सिक्के एवं मुद्रा प्रणाली” विषयक द्वि-दिवसीय संगोष्ठी के समापन समारोह के मुख्य अतिथि संस्कृति मंत्री छत्तीसगढ़ शासन श्री राजेश अग्रवाल ने देशभर से पधारे विद्वानों, विषय विशेषज्ञों, विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को संबोधित करते हुए कहा की रीवां उत्खनन के परिणाम अत्यंत उत्साहजनक हैं। उन्होंने कहा कि यहां आहत सिक्कों से लेकर कल्चुरी कालीन सिक्कों तक की एक अविच्छिन्न श्रृंखला प्राप्त हुई है, जो इस क्षेत्र की ऐतिहासिक निरंतरता को प्रमाणित करती है। श्री अग्रवाल ने बताया कि हालिया उत्खनन में प्राप्त लौह प्रगलन केंद्र तथा रेडियोकार्बन तिथि निर्धारण के आधार पर रीवां की प्राचीनता 9 वीं सदी ईसा पूर्व (उत्तर वैदिक काल) तक निर्धारित की गई है, जो छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास और तकनीकी परंपरा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण उपलब्धि है। छत्तीसगढ़ की धरती एक अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और गौरवशाली सभ्यता की साक्षी रही है। हमारी संस्कृति और इतिहास की जड़ें अत्यंत गहरी हैं, जिन्हें वैज्ञानिक दृष्टि से उजागर करना हम सभी का दायित्व है। यह खोज छत्तीसगढ़ की प्राचीन तकनीकी दक्षता, आर्थिक व्यवस्था और सांस्कृतिक निरंतरता को सशक्त रूप से प्रमाणित करती है।

       छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 25 किलोमीटर पूर्व स्थित ग्राम रीवां (रीवांगढ़) में चल रहे पुरातात्विक उत्खनन ने प्रदेश के प्राचीन इतिहास को लेकर नई और महत्वपूर्ण जानकारी सामने रखी है। संस्कृति विभाग के पुरातत्त्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय संचालनालय द्वारा कराए जा रहे इस उत्खनन में वैज्ञानिक ए.एम.एस. रेडियोकार्बन (कार्बन-14) डेटिंग के माध्यम से यह प्रमाणित हुआ है कि इस क्षेत्र में मानव सभ्यता उत्तर वैदिक काल यानी 800 ईसा पूर्व से भी पहले विकसित हो चुकी थी।

       रीवां का यह प्राचीन स्थल कोलहान नाला और बंधवा तालाब के बीच स्थित है। स्थानीय जनमानस में यहां लोरिक-चंदा की लोककथा पीढ़ियों से प्रचलित रही है। क्षेत्र की विशिष्ट भौगोलिक बनावट के कारण इसे मृत्तिकागढ़ या मडफोर्ट भी कहा जाता है। चंडी मंदिर के समीप लगभग 75 एकड़ में फैले मृत्तिकागढ़, उसके चारों ओर खाई और परकोटे के अवशेष आज भी इसकी प्राचीनता के साक्ष्य देते हैं।

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