छत्तीसगढ़दुर्ग-भिलाई
छत्तीसगढ़: आरक्षण और प्रत्यक्ष चुनाव संशोधन पर उठे सवाल

ओबीसी आरक्षण: सरकार के 50% दावे पर आरटीआई विभाग ने किया सवाल
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन का आरोप
राजनीतिक लाभ के लिए नियमों में बदलाव का आरोप
आरक्षण और चुनाव प्रणाली में पारदर्शिता की मांग
दुर्ग। छत्तीसगढ़ में नगरीय निकाय और पंचायत चुनावों में आरक्षण और प्रत्यक्ष चुनाव से जुड़े विवादों को लेकर आरटीआई विभाग के जिला अध्यक्ष अली हुसैन सिद्दीकी ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
ओबीसी आरक्षण में छलावा
- आरक्षण की असमंजसता:
- 50% आरक्षण का दावा: सरकार ने ओबीसी वर्ग को 50% आरक्षण देने का दावा किया, लेकिन यह सच्चाई से परे है।
- आरक्षण का वास्तविक प्रावधान:
- जहां एससी-एसटी का आरक्षण 50% या अधिक है, वहां ओबीसी का आरक्षण शून्य होगा।
- जहां एससी-एसटी आरक्षण 50% से कम है, वहां ओबीसी को जनसंख्या अनुपात के अनुसार आरक्षण मिलेगा, लेकिन कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं हो सकता।
- यह संशोधन छत्तीसगढ़ नगरपालिक निगम (संशोधन) अध्यादेश, 2024 के तहत पारित किया गया।
- ओबीसी कल्याण आयोग का सुझाव:
- आयोग ने ओबीसी की जनसंख्या के आधार पर आरक्षण की सिफारिश की थी।
- इसके बावजूद ओबीसी वर्ग को 50% आरक्षण का लाभ मिलते हुए नहीं दिख रहा है।
- संशोधित नियमों के कारण ओबीसी आरक्षण का वास्तविक लाभ सीमित हो गया है।
- सरकार पर छलावे का आरोप:
- 50% आरक्षण का दावा केवल जनता को भ्रमित करने और राजनीतिक लाभ के लिए किया गया।
- पहले 25% आरक्षण था, और अब कई क्षेत्रों में यह शून्य हो जाएगा।
प्रत्यक्ष चुनाव पर सवाल
- महापौर/अध्यक्ष का प्रत्यक्ष चुनाव:
- पहले महापौर और अध्यक्षों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से होता था, जहां पार्षद बहुमत के आधार पर अपना नेता चुनते थे।
- अब प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली लागू की गई है, जिससे जनता सीधे महापौर/अध्यक्ष चुनती है।
- प्रत्यक्ष चुनाव के नुकसान:
- यदि महापौर/अध्यक्ष एक पार्टी का चुना जाता है और सामान्य सभा में दूसरी पार्टी का बहुमत होता है, तो कार्य निष्पादन में बाधाएं आ सकती हैं।
- लोकतांत्रिक प्रणाली में यह प्रक्रिया असंगत हो सकती है।
- राजनीतिक उद्देश्य:
- पिछली बार अप्रत्यक्ष चुनाव के दौरान छत्तीसगढ़ में बीजेपी का एक भी महापौर नहीं जीत सका था।
- हार के डर से बीजेपी सरकार ने नियमों में बदलाव किया और प्रत्यक्ष चुनाव लागू किए।
- यह कदम सत्ता और शासन पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए उठाया गया प्रतीत होता है।
- लोकतंत्र पर असर:
- लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पार्षदों का अधिकार छीना गया।
- विधायक मुख्यमंत्री और सांसद प्रधानमंत्री चुनते हैं, तो पार्षद महापौर/अध्यक्ष क्यों नहीं चुन सकते?
आरक्षण और चुनाव प्रणाली में किए गए संशोधन ओबीसी वर्ग और स्थानीय निकायों की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर सवाल खड़ा करते हैं।
- ओबीसी वर्ग को उनके जनसंख्या अनुपात के अनुसार आरक्षण का लाभ सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।
- प्रत्यक्ष चुनाव के बजाय पार्षदों को महापौर/अध्यक्ष चुनने का अधिकार बहाल करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है।
सरकार को इन मुद्दों पर स्पष्टता और पारदर्शिता के साथ जवाब देना चाहिए।



